हर घर में झंडा हो न हो,
हर मन तिरंगा बाँध लें,
केसरिया, हरा, श्वेत, नीला,
इनको हम पेहचान लें,
मिले जब ये रंग-अनूठे,
तब ही उभरे शान रे!

हिमगिरी, कन्याकुमारी,
कच्च, अरुणाचल समेत,
भिन्न भाषा, भिन्न पोषा,
भिन्न रीत, विभिन्न क्षेत्र;
सिल-जुड़े जो एक वो चादर,
ओढ़ना, अभिमान है|

जहां भेद भाव न हो,
जहां भूक और प्यास न हो,
हर मनुष्य का सम्मान हो,
हर गांव-खेत हरियाल हो,
शिक्षा, नीति अभियान हो
बनायें ऐसा देश रे!

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